राजा के कद से विपक्ष में अभी भी खौफ

*राजा के कद से विपक्ष में अभी भी खौफ*


 *विपक्ष पर मंडरा रहा है खतरा*


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● दिग्विजय सिंह की जीवटता का भय इतना की अब सभी दलबदलू उनका सामना कैसे करेंगे ? 


 


● उन्हें उप चुनाव मैं कैसे रोका जाय इन सब बातो की चिंता को लेकर bjp ओर हाल ही मैं घोषित ग़द्दार ओर पदलोलुप लोगों का प्लान है । चूकी पहले ग्वालियर महल के हिसाब से ग्वालियर चम्बल मे Bjp ओर कांग्रेस् के प्रत्याशी तय होते थे सायद अब ओह अध्याय समाप्त हो गया हे अब पहले के नमूने आपके सामने हे हारने लिए टिकट दिए जाते थे अब ये बुआ भतीजा अध्याय समाप्त है ।अब सिर्फ़ काबिल को ही पार्टी उम्मीदवार बनाएगी दण्डवत ओर चापलूसी करने बाले आपके विरोध मैं चुनाव लड़ेंगे


 


● मप्र की राजनीति में पिछले एक पखवाड़े से जो हुआ वह किसी एक दिन या एक व्यक्ति की सोच व योजना का परिणाम नहीं है। मप्र की कांग्रेस सरकार को गिराने की (कु) योजनाएं तो सरकार गठन के भी पहले से आरंभ हो गई थीं। बार-बार के प्रयासों के बाद भाजपा का 15 महिनों बाद सफलता मिली है। भाजपा की इस ‘रणनीतिक’ जीत के शिल्पिकारों की जितनी चर्चा हो रही है उससे अधिक चर्चा कांग्रेस की सरकार खोने के दोषियों की हो रही है। और इस बार भी इस दोषारोपण के केंद्र में हैं पूर्व मुख्यीमंत्री दिग्विजय सिंह। क्याच भाजपा, क्या राजनीतिक विश्लेरषक और क्यां ही कांग्रेस के नेता ही, सभी की आलोचना का केंद्र दिग्विजय सिंह और उनकी राजनीति हैं। दिग्विजय पर हो रहे इस हमले के राजनीतिक निहितार्थ को भी समझा जाना चाहिए।


 


● वह दौर बहुत पीछे छूट गया जब राजनीतिक पर्दे के पीछे रह कर काम करने का नाम हुआ करती थी। अब यह चेहरा दिखाने का उपक्रम हो गई है। यही कारण है कि राजनेताओं को हमेशा यह भय रहता है कि यदि वे चर्चा से बाहर हो जाएंगे तो परिदृश्य से ही बाहर हो जाएंगे। ऐसे समय में भी क्या यह दस सालों तक सक्रिय राजनीति से दूर रहने के वक्त भी दिग्विजय सिंह पर लगातार राजनीतिक हमले जारी रहे। यहां तक कि उनके सत्ता से हटने के 15 सालों के दौरान भी जब जब प्रदेश में कोई भी चुनाव हुआ भाजपा ने उन्हें ही अपने आक्रमण का केंद्र रखा। इसका ताजा उदाहरण कमलनाथ सरकार का जाना भी है। 


● याद कीजिए, 2 मार्च को जब दिल्ली में प्रेस वार्ता कर दिग्विजय सिंह ने भाजपा द्वारा विधायकों को बंधक बनाने और प्रलोभन दे कर तोड़ने का मामला न उठाया होता तो भाजपा को सरकार गिराने में इतना वक्त् भी न लगता। तब कहा गया कि सिंह ने अपनी राज्य सभा टिकट सुनिश्चित करने के लिए यह योजना रची। तथ्यय तो यह है कि दिग्विजय सिंह ने समय रहते इस संकट को न भांपा अन्य‍था समूची कांग्रेस तो सुकून में ही थी। 


● भाजपा का जब पहला प्ला न फेल हुआ तो केन्द्री य नेतृत्वी के साथ मिल कर और बड़ी योजना रची गई और ज्योतिरादित्य् सिंधिया की नाराजी का लाभ उठा कर उनके समर्थक 22 विधायकों को ‘बंधक’ बना कर बेंगलुरु भेज दिया गया। सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ दी। कहा गया कि हाईकमान ने उनके सम्मानन का ध्यावन न रखा। वह कांग्रेस जिसके मुखिया गांधी परिवार में सिंधिया की बेरोकटोक आवाजाही थी। कहा गया कि सिंधिया को सोनिया गांधी से मिलने का समय नहीं मिला। न वे अपने मित्र राहुल गांधी से मिल पाए। हालांकि स्वंयं राहुल गांधी ने इस बात का खंडन किया। राहुल गांधी ने कहा कि सिंधिया को कांग्रेस में अपना राजनीतिक भविष्या नहीं दिखाई दे रहा था इसलिए विचारधारा को जेब में रख लिया। आकलन यह भी हुआ कि जिस तरह राजमाता विजयराजे सिंधिया ने तत्कािलीन मुख्यबमंत्री डी.पी. मिश्रा की टिप्पिणी से नाराज हो कर कांग्रेस छोड़ दी थी। उसर तरह मुख्येमंत्री कमलनाथ की एक टिप्पोणी ने ज्यो तिरादित्यब की नाराजी को बढ़ाया। मगर, इन परिस्थितियों से उलट सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने का ठिकरा भी दिग्विजय सिंह के सिर ही फोड़ा गया।


 


● मप्र की राजनीति को करीब से जानने वाले समझते हैं कि तमाम मतभेद के बाद भी विधानसभा चुनाव के दौरान दिग्विजय सिंह और सिंधिया ने सकारात्मबक पहल करते हुए एका दिखाया था। यहां तक अभी बीते माह मनमुटाव की खबरें वायरल हुई तो दि‍ग्विजय सिंह ने सिंधिया से उनके ही क्षेत्र गुना में मुलाकात तय की। इस मुलाकात को सिंधिया ने ही रद्द किया। बंद कमरे की मुलाकात सड़क पर स्वागत की औपचारिकता में ही खत्म। हो गई। चुप्पी तोड़ने के दिग्विजय के इस प्रयास को कहीं रेखांकित नहीं किया गया। 


 


● यहां यह प्रश्ना उठता है कि सिंधिया की राजनीतिक महत्वकांक्षा की पूर्ति या उनके उपयुक्त सम्मान का निर्णय क्या कांग्रेस में अकेले दिग्विजय पर निर्भर है? 


● क्या‍ सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष न बनने देने, या उन्हें मुख्यमंत्री न बनने देने, या अन्य पद न मिलने देने में दिग्विजय की ही राय ने ही मायने रखे? 


● यदि वे इतने ही ताकतवर थे कि गांधी परिवार के अभिन्न सिंधिया को उनके मनचाहे पद से दूर रखवा सकते थे तो उन्हें फिर अपनी राज्यसभा टिकट पक्की करने के लिए विधायकों को गुरुग्राम में अगुवा करने जैसी साजिश रचने की क्या आवश्यकता थी, जैसा उन आरोप लगा? 


 


● अब बात करते हैं भाजपा के सत्ता गिराने के षड्यंत्र की। सिंधिया के जाने के बाद यह लगभग तय हो गया था कि उनके समर्थक 22 विधायक भी कांग्रेस छोड़ देंगे लेकिन प्रदेश में कांग्रेस सरकार बचाने के लिए दो नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह ही किला भिड़ाते रहे। वे अकेले न केवल प्रदेश भाजपा बल्कि कर्नाटक की भाजपा सरकार और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व से भिड़ते रहे। इस सत्ता संघर्ष में कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अजीब सी खामोशी ओढ़े रहा तो प्रदेश के कई नेता विवादास्पद बयान दे कर दिग्विजय सिंह के प्रयासों को राजनीति के चश्मे से देखते रहे। वे लगातार कमलनाथ सरकार की विफलता के लिए दिग्विजय को विलेन बनाते रहे ताकि नाथ-दिग्विजय के मन में खटास पैदा की जा सके।


   


● असल में, दिग्विजय सिंह पर बीते दो दशक से जारी इस हमले के पीछे मप्र में उनकी राजनीतिक सक्रियता और चेतन्य उपस्थिति है। भाजपा जानती है कि जितनी मैदानी पकड़ और राजनीति समझ सिंह है उतना किसी अन्य नेता में नहीं है। इसी कारण संघ से लेकर समर्थक मीडिया विश्लेषक भी सिंह को ही निशाने पर रखते हैं। कांग्रेस की अंदरूनी राजनति भी यही कर रही है। प्रादेशिक राजनीति को विभाजित कर ही कांग्रेस की ताकत को घटाया जा सकता है। सिंधिया के भाजपा में जाने और कमलनाथ सरकार के गिरने के बाद अब टारगेट दिग्विजय सिंह की सक्रियता ही है। वे सक्रिय नहीं होंगे तभी भाजपा का ‘कांग्रेस मुक्ती देश’ का सपना साकार होगा। वे सक्रिय नहीं रहेंगे तभी प्रदेश में कांग्रेस विंध्य, बघेलखंड, मालवा निमाड़, ग्वालियर-चंबल जैसे क्षेत्रों और यहां के क्षेत्रीय नेताओं में खो कर रह जाएगी। मप्र कांग्रेस के साथ हुई हर दुर्घटना के पीछे दिग्विजय को विलेन साबित करने की सोच का लक्ष्य भी तो यही है।


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